Conscience| Sub Conscience

Conscience| Sub Conscience

सभी मनुष्यों की श्रद्धा उनके अन्तःकरण के अनुरूप होती है |

ईश्वरीय न्याय की चक्की यधपि मन्द गति से चलती है ,लेकिन चलती अवश्य है |

मस्तिष्क स्वयं अपने में ही स्वर्ग को नरक और नरक को स्वर्ग में बदल सकता है |

जब आप अपनी आंतरिक शक्ति को हपचन लेते हैं तब आप में वह साहस आ जाता है कि शेर का सामना करने में भी नहीं हिचकते |

सुनना भी सीखो ,कभी -कभी मौका बहुत आहिस्ता से दस्तक देता है |

होशियार रहिए ,लालच देने के लिए भी मौका आपका दरवाजा खटखटाता है |

एक बार अंतःकरण की ओर आँख घुमाओ ,तुरन्त समस्त अर्थ समझ में आ जायेंगे |

चिंता चिंता दूर होती है | इसे धोखे से रोकने का प्रयास करने से परिणाम उल्टा होता है |

बच्चा बीमार हो तो माँ को दुआ माँगने का सलीका आ ही जाता है |

सलीका खाइए और अनाज की कद्र कीजिए |

गमगीन रहने का राज यह है कि आप इस सोच लगे रहें कि आप खुश हैं या नहीं |

औरत खूबसूरती तब तक कायम रहती है ,जब तक वो अपनी शर्म और ह्या कायम रखती है |

संतान खूबसूरती तब तक कायम रहती है ,जब तक दिल में तसव्वुर हो |

संतान की खूबसूरती तब तक क़याम रहती है ,जब तक वो अपने माता -पिता की इज्जत करते हैं |

दौलत की खूबसूरती तब तक कायम रहती है ,जब तक नीयत साफ रहती है |

शोहरत की खूबसूरती तब तक कायम रहती है ,जब तक दिल में तसव्वुर हो |

इन्सान की खूबसूरती तब तक कायम रहती है ,जब तक खुदा पर यकीन रहता है और उसके रसूल की सुन्नतों को जिन्दा रखता है |

गुरुर इन्सान को जिल्ल्त के सबसे गहरे समन्दर में दाखिल कर देता है जिससे बाहर निकलना नामुमकिन है |

दूसरों के लिए जीना ही इन्सानियत कहलाती है |

कम बोलने में ही समझदारी है ,जो शख्स ज्यादा बोलता है वह वेवकूफ होता है |

अपनी लम्हे भर की ख़ुशी के लिए दूसरों के होठों की मुस्कराहट मत छीनो |

दौलत तो इंसान के पाद एकदम आ सकती है लेकिन तहज़ीब (समझ )धीरे -धीरे ही आती है |

रोटी का टुकड़ा और मामूली कपड़ा सलामती से आता रहे तो यह उस ऐश से बेहतर है जिसमें तोहमत और शर्मिन्दगी उठानी पड़े |

बच्चों को तमीज़ सिखाने के लिए जरूरी है कि उन्हें तमीज़ से पुकारा जाए |

अपने आपको हरगिज तन्हा न कहो ,तुम्हारी साँस तुम्हारे साथ है ,तुम्हारी रूह तुम्हारे साथ है ,तुम्हारा खुदा तुम्हारे साथ है |

विश्व के सभी धर्म ही धर्म के विभिन्न अंग हैं एवं सम्पूर्ण में एक प्रकार की धार्मिक एकता का भाव जागना ही चाहिए | उसकेबीच भेद भाव मानना नितांत अज्ञानता की बात है | मनुष्य सर्वत्र अन्न ही खाता है ,किंतु अलग -अलग देशों में अन्न से भोजन करने की विधियाँ अनेक हैं | धर्म मनुष्य की आत्मा का है एवं देश -देश में उसके भी अनेक रूप हैं | धर्म के विरुद्ध संसार में जो भयानक प्रतिक्रियाएँ हैं ,उसका दोष ,धर्म पर नहीं धर्म के गलत प्रयोग पर है | जैसे विज्ञान से उठने वाली भीषणतााओं का दायित्व विज्ञान पर नहीं उसके दुरूपयोग पर है |

Updated: April 10, 2021 — 6:28 am

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